प्रेम लगना और प्रेम में खो जाना—दो अलग अवस्थाएँ हैं। यह भजन दूसरी अवस्था गाता है: ‘लागी प्रीत मोरी कान्हा से’ के बाद मन कहीं और टिकता ही नहीं।
किस तरह का भजन है यह?
कृष्ण-प्रेम / श्याम दीवानी शैली। यहाँ शिकायत कम, आसक्ति और नाम-रटन अधिक है। ब्रज-स्मृति—बाँसुरी, मोर, चारों दिशा में कन्हैया—गीत को रंग देती है।
पूरे बोल (हिंदी)
लागी लागी रे लागी लागी रे, लागी प्रीत मोरी कान्हा से।
लागी लागी रे लागी लागी रे, लागी प्रीत मोरी कान्हा से।
कान्हा कान्हा जाप बिना, चैन कहाँ अब पावे मन।
श्याम बिना सब सूना लागे, उनमें ही खोया मेरा मन।
बंसी की धुन जब वो बजाए, वन-उपवन के मोर नचाए।
मैं तो जोगन श्याम दीवानी, पकड़ूँ उसे, वो हाथ ना आए।
लागी रे प्रीत मोरी, कान्हा से लागी प्रीत मोरी।
लागी तो से प्रीत कन्हैया, तुझ में ही लागा मोरा जिया।
चारों दिशा में दिखता मुझे तू, चेहरा है प्यारा तेरा कन्हैया।
ब्रज के हम हैं प्रेमी पुराने, श्याम सिवा मन कुछ भी ना जाने।
मेरा तन-मन तुझको ही पूजे, कान्हा कान्हा नाम ही गूँजे।
अर्थ की परतें
पहला डंक सीधा है—प्रीत लग गई। फिर परिणाम: जाप बिना चैन नहीं, श्याम बिना सूना। यह वैराग्य का सूखा पाठ नहीं; रंग भरा प्रेम है।
‘जोगन श्याम दीवानी’ पंक्ति मीरा-परंपरा की याद दिलाती है—साधना का वेश भी प्रेम के लिए। ‘पकड़ूँ… हाथ ना आए’ में लीला का खेल बचता है: पास भी, पकड़ से परे भी।
‘ब्रज के प्रेमी पुराने’ काल और जन्म की सीमाएँ हटाता है—भक्ति को नित्य संबंध बनाता है।
गायन का छोटा सुझाव
कोरस ‘लागी लागी रे’ पर ताली/मंजीरा अच्छा बैठता है। बच्चों को पहले केवल यही दोहराव सिखाएँ; अंतरे बाद में।
इस गीत की पहचान
यह कान्हा-प्रीत का भजन है—‘श्याम दीवानी’ परंपरा की ओर खुलता है, जहाँ मन कहीं और टिकता नहीं। ‘जोगन श्याम दीवानी’ जैसी पंक्तियाँ मीरा-समकालीन लोक भक्ति की स्मृति दिलाती हैं, पर हर गायक का स्वर अलग हो सकता है।
कोरस ‘लागी लागी रे’ सामूहिक गाने में आसानी से जुड़ जाता है; अंतरों में ब्रज-स्मृति (बाँसुरी, मोर, चारों दिशा) है।
प्रीत लगना
‘कान्हा कान्हा जाप बिना चैन नहीं’—नाम-स्मरण। ‘श्याम दीवानी’—मन की आसक्ति।
ब्रज-चित्र
बाँसुरी, मोर, चारों दिशा—एकता का अनुभव। ‘हाथ न आए’—लीला: पास भी, पकड़ से परे।
सत्संग में क्रम
पहले कोरस ‘लागी लागी रे’, फिर अंतरे। ताली में बुजुर्गों का ध्यान।
भाव की श्रेणी
मुख्य स्वर प्रीत-आसक्ति; पूर्ण विरह-शिकायत वाला ढाँचा नहीं।
FAQ
श्याम दीवानी का मतलब?
श्याम (कृष्ण) के प्रेम में दीवानी/तन्मय अवस्था।
क्या यह विरह भजन है?
मुख्य स्वर प्रेम-आसक्ति का है; हल्की अतृप्ति ‘हाथ ना आए’ में है, पर पूरा ढाँचा विरह-शिकायत वाला नहीं।
प्रीत लगने के बाद का दिनचर्या
जब प्रीत कान्हा से लग जाए, बाहर का शोर कम लगता है—यही भाव गीत का केंद्र है। ‘जोगन श्याम दीवानी’ मीरा-समकालीन स्मृति जगाता है; हर गायक का स्वर अलग हो सकता है।
बाँसुरी, मोर, चारों दिशा—ब्रज की एकता का चित्र। ‘हाथ न आए’ में लीला: पास भी, पकड़ से परे।
सत्संग में पहले कोरस, फिर अंतरे। ताली तेज हो तो बुजुर्गों का ध्यान। मुख्य स्वर आसक्तi; पूर्ण विरह-शिकायत वाला ढाँचा नहीं।
॥ लागी प्रीत मोरी कान्हा से · राधे-राधे ॥