भजन कभी राज्य माँगते हैं, कभी संकट हटाने की भीख। यह वाला सिर्फ आँखों की प्यास गाता है—‘दर्शन दीजो जी’।
स्वर और संबोधन
‘मन मोहन’—जो मन को मोह ले। भाषा घर-आँगन जैसी है; इसलिए परिवार सत्संग में जल्दी बैठ जाती है।
प्रचलित बोल (सार-स्वरूप)
मन मोहन प्यारा दर्शन दीजो जी,
मन मोहन प्यारा दर्शन दीजो जी।
बिन दर्शन कल ना परे, ज्योत जगाई दुआर…
आओ जी गिरधारी, नैनन को तरस बुझाओ जी॥
(विभिन्न गायकों/परंपराओं में अंतरे थोड़े भिन्न मिल सकते हैं।)
माँग क्या है, क्या नहीं
यहाँ धन-पद की सूची नहीं। ‘कल ना परे’—बेचैनी का नाम है। ज्योत दुआर पर—घर की तैयारी हो चुकी, अब आगमन तुम्हारा। गिरधारी कहकर लीला-स्मृति जोड़ दी गई।
इस गीत की पहचान
‘मन मोहन’ = मन को मोहने वाले कृष्ण। यहाँ माँग धन-राज्य नहीं, दर्शन की है—‘जी’ लगकर बोलचाल की कोमलता। ‘ज्योत जगाई दुआर’ घरेलू पूजा की भाषा है: तैयारी हो चुकी, अब प्रभु के आगमन की बात।
कई गायकों में अंतरे थोड़े भिन्न मिलते हैं; घर की परंपरा को प्रधान रखें।
‘जी’ और दर्शन-याचना
‘दर्शन दीजो जी’ में ‘जी’ घरेलू सम्मान है। राज-माँग नहीं; द्वार पर ज्योत की स्मृति। ‘बिन दर्शन कल ना परे’—बिना झलक के मन शांत नहीं।
मन मोहन और गिरधारी
‘मन मोहन’ रूप; ‘गिरधारी’ गोवर्धन-लीला—जो संकट में खड़े हुए। दर्शन नेत्र-सुख के साथ विश्वास भी जोड़ता है।
कुछ संस्करणों में ‘दुआर’ की जगह ‘घर’—अर्थ: तैयारी हो चुकी, अब आगमन।
संस्कार और सत्संग
जन्मदिन, गृह-प्रवेश या शाम की छोटी आरती के बाद अक्सर गाया जाता है। समय कम हो तो पहली पंक्तियाँ और ‘नैनन को तरस बुझाओ’—भाव प्रधान।
लिरिक्स और अधिकार
बोल सामान्य परंपरा के सार हैं। अधिकार संबंधी विवाद हो तो सामग्री व अधिकार पेज देखें। व्याख्या श्रद्धावाणी की स्वतंत्र लेखनी है।
FAQ
क्या एक लेखक के हैं?
कई प्रस्तुतियाँ लोक/आधुनिक गायकी में फैली हैं; बोल-संस्करण भिन्न हो सकते हैं।
घरेलू दीप और दर्शन की प्यास
जब द्वार पर ज्योत जल चुकी हो और मन कहे—बस एक झलक, तब यह भजन उठता है। यहाँ धन, पद या विजय की सूची नहीं; केवल नेत्रों की तृषा। ‘जी’ लगकर बोलचाल की कोमलता बनी रहती है।
विभिन्न गायकों में ‘गिरधारी’, ‘मोहन’ या ‘श्याम’ जैसे संबोधन थोड़े बदल सकते हैं। परिवार एक संस्करण चुनकर रखे। शाम के सत्संग में धीमी लय रखें ताकि विनम्र स्वर साफ सुनाई दे।
बच्चों को पहले केवल पहली दो पंक्तियाँ सिखाएँ—दर्शन का अर्थ फोटो नहीं, मन में उपस्थिति। बुजुर्गों के लिए बैठकर, बिना तेज़ माइक के गाना श्रद्धा बढ़ाता है।
शाम की छोटी आरती के बाद
काम-काज समाप्त होने पर घर में दीप जलाकर यह भजन गुनगुनाया जा सकता है—लंबा पाठ जरूरी नहीं। परिवार का कोई एक सदस्य ‘दर्शन दीजो जी’ पर आगे बढ़े; बच्चे और बuजुर्ग दोनों जुड़ जाते हैं। आवाज़ से पड़ोस को तकलीफ न हो—यह भी आध्यात्मिक शिष्टाचार है। अलग-अलग गायकों में अंतर हो तो एक ही पुस्तक या एक ही रिकॉर्डिंग पर टिकें।
॥ राधे कृष्ण ॥