कभी-कभी प्रेम ऐसा होता है कि मिलन के बाद भी तृप्ति नहीं आती। कृष्ण भक्तों का यह विरह गीत उसी अतृप्ति को गाता है—‘तुझे देख के जी भरता ही नहीं’।

भजन एक दृष्टि में

  • भाव: विरह, व्याकुलता, दर्शन की प्यास
  • इष्ट: साँवरिया / मोहन / कन्हैया
  • स्वर: लोक-कृष्ण विरह परंपरा

हिंदी लिरिक्स

तुझे देख के जी भरता ही नहीं, तुझे देख के जी भरता ही नहीं।
अब जाऊँ कहाँ मैं साँवरिया, अब जाऊँ कहाँ मैं साँवरिया।
मोहन छोड़ गए, दिल तोड़ गए,
अब बनके फिरूँ मैं बावरिया, अब बनके फिरूँ मैं बावरिया।
अब जाऊँ कहाँ मैं साँवरिया।

मुरली की मीठी तानों पर, दिल मेरा कन्हैया खोने लगा।
मुरली की मीठी तानों पर, दिल मेरा कन्हैया होने लगा।
अब आ के सुना दो बाँसुरिया, अब आ के सुना दो बाँसुरिया।
अब मिल भी जाओ साँवरिया।

तिरछी चितवन, बाँकी है अदा, तेरे नैन कटीले कजरारे।
अब तेरे बिना दिल लगता नहीं।
अब काहे सताए साँवरिया, अब मिल भी जाओ साँवरिया।

तुझे देख के जी भरता ही नहीं,
अब जाऊँ कहाँ मैं साँवरिया॥

पंक्ति-दर-पंक्ति भाव

जी भरता ही नहीं का मतलब है—दर्शन की भूख शांत नहीं होती। भक्त कहता है: और देखूँ, फिर भी कम है।

अब जाऊँ कहाँ में संसार के विकल्प खत्म हो चुके लगते हैं। शरण एक ही है—साँवरिया।

बावरिया बनना यहाँ अपमान नहीं, प्रेम में सुधि खो देने की अवस्था है। मुरली की तान पर मन ‘कन्हैया होने’ लगता है—यानी नाम और रूप में लीनता।

अंत में नैन-अदा का चित्रण रूप-स्मरण है; शिकायत भी प्रेम से निकली है—‘काहे सताए’, पर माँग वही: मिल जाओ।

यह गीत किसे छूता है

जो कृष्ण से दूरी महसूस करते हैं—शारीरिक यात्रा न सही, मन की दूरी—उनके लिए यह पुकार निजी लगती है। सत्संग में धीमी लय में गाने से विरह-रस गहराता है।

इस गीत की पहचान

‘साँवरिया’ यहाँ सांवले रंग वाले कान्हा/श्याम को कहते हैं। मुख्य भाव विरह है—मिलन के बाद भी मन न भरना, यानी प्रेम की प्यास बनी रहना। यह शिकायत जैसा सुनता है, पर ब्रज भक्ति में इसे ‘अतृप्त दर्शन’ का रस माना जाता है।

अलग-अलग गायकों और क्षेत्रों में अंतरे मिल सकते हैं; सत्संग में जो रूप सुनाए जाते हैं, उन्हीं से अर्थ समझना सबसे साफ रहता है।

दर्शन की अतृpti

देखकर भी न भरना—प्रेम की प्यास। ‘साँवरिया’—सांवले रंग वाले कान्हा। ‘अब जाऊँ कहाँ’—शरण एक ही बची है।

मुरली और नैन

मुरली पर मन लीन; ‘काहे सताए’—प्रेम की शिकायत।

बावरिया

प्रेम में दीवानापन—ब्रज की बोली; बच्चों को समझाएँ: अपमान नहीं, पुरानी भक्ति-भाषा है।

घर पर

धीमी लय में सुनें; एक पंक्ति हफ़्ते भर याद रखें। विभिन्न गायकों में अंतर हो सकता है—एक पारिवारिक संस्करण चुनकर रखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह भजन किस भाव का है?

मुख्यतः कृष्ण विरह और अतृप्त दर्शन-प्यास का।

‘बावरिया’ का क्या अर्थ है?

प्रेम में दीवाना/पागल-सा हो जाना—ब्रज बोलियों में प्रचलित भाव।

घर पर कैसे गाएँ?

दोहराव वाली पंक्तियाँ सामूहिक स्वर में अच्छी लगती हैं; अर्थ समझकर गाएँ।

अतृpti का रस

देखकर भी न भरना—प्रेम की प्यास, शिकायत नहीं। ‘साँवरिया’ सांवले कान्हा को कहते हैं। ‘अब जाऊँ कहाँ’—शरण एक ही बची है।

मुरली और नैन-अदा—रूप-स्मरण; ‘काहे सताए’ प्रेम भरी शिकायत। ‘बावरिया’ अपमान नहीं, ब्रज की बोली।

धीमी लय में सुनें। एक पंक्ति हफ़्ते भर याद रखें। विभिन्न गायकों में शब्द थोड़े बदल सकते हैं—घर में एक संस्करण तय करके रखें। लंबी सूची से अधिक इस एक गीत में डूबना अक्सर ज्यादा असर करता है।

॥ साँवरिया मिल जाओ · जय श्री कृष्ण ॥